Monday, 11 April 2011

आज फिर..........

आज फिर हमको वो कसम याद आई है
आज फिर आँखों में दो बूँद उतर आई है

आज फिर..........
बस्ती-ए-दिल थी गुलजार फ़कत होने से
आज क्यूँ इसमें वीरानी सी इक छाई है
आज फिर..........
ऐ चाँद तू उनसे कह देना मगर चुपके से
आज फिर दिल में तेरी याद उतर आई है
आज फिर..........
रास्ते हैं सूने जिन्दगी के लेकिन/मगर
साथ मेरे तेरी यादों की परछाई है
आज फिर...........
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Sunday, 10 April 2011

"और फिर "

"और फिर "

उन आँखों कि गहराई में हम यूँ खो गए
कहने लगे लोग कि बस दीवाने हो गए
इस दिल की झनकार में कोई झूमे तो झूमे "बादल"
किसको पता कि दिल के टुकड़े हजार हो गए...........

अभी कल ही............

कल हमने दिन में रात होते देखी
सूरज से चांदनी की मुलाकात होते देखी
किसी ने कहा क़यामत तो किसी ने जलवा-ए-हुश्न
हमने अपनी बस्ती-ए-दिल तमाम होते देखी


लोग कहते हैं कि नजरों कि जुवां नहीं होती
हमने इन आँखों कि आँखों से बात होते देखी
वादी-ए-दिल में जुल्फों कि घटा यूँ लहराई "बादल"
कि, पलकों तले भि हल्की बरसात होते देखी

Saturday, 9 April 2011


__इन्तहा__
तेरी महफ़िल में ये पागल ये दीवाना आया है
तेर दीदार की हसरत में ये परवाना आया है
अब रखे दिल में इसको या जमाना मार दे ठोकर
ज़माने से बगावत कर के तुझपे मिटने आया है
ये तेरी ही निगाहों की नशीली प्यास है शाकी
खड़ा हूँ मय में दिल में प्यास है फिर भी मगर बाकी
प्याला तो मै पा लूँगा मगर तेरे इश्क़ की हाला
जो नज़रों से पिला दे तो लगेगी मौत भी फीकी
ये परवानों की हस्ती है की मिट के मिट नहीं पायी
शमा उनको जलाके खुद भी जिन्दा रह नहीं पायी
ये परवाना हमेशा तुझ पे ही मिट जाता है शमा
मगर इसको जलाके तू भि आंशू रोक न पायी
समंदर है नहीं वाकिफ़ मेरी इस प्यास से 'बादल'
नहीं तो मिन्नतें करता वो तेरा थाम के आँचल
दो कतरा इश्क़ का तेरी है मेरी प्यास से ज्यादा
जो चाहे तो पिला/जिला दे या रख दे प्यास से पागल............
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